क्या विवादित मशीनें खतरे में डाल देंगी मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा ट्रांजिट सपना?
मध्य प्रदेश के दो प्रमुख महानगर—भोपाल और इंदौर—में मेट्रो परियोजनाओं का निर्माण कार्य तेज़ गति से चल रहा है। ये दोनों परियोजनाएं आने वाले वर्षों में न केवल शहरी आवागमन की दिशा बदलेंगी, बल्कि प्रदेश के आर्थिक और औद्योगिक विकास की रीढ़ भी बनेंगी।
लेकिन इंदौर मेट्रो के भूमिगत खंड (Package IN-05R) को लेकर हाल के दिनों में जो जानकारियाँ सामने आई हैं, उन्होंने तकनीकी विशेषज्ञों में गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
यह पैकेज देश की प्रतिष्ठित कंपनियों हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी (HCC) और टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड के संयुक्त उपक्रम को सौंपा गया है। सवाल इन कंपनियों की क्षमता पर नहीं, बल्कि उन टनल बोरिंग मशीनों की क्षमता (TBM) पर उठ रहे हैं, जिनके भरोसे इंदौर की ज़मीन के नीचे सुरंगें बनाई जानी हैं।
₹2,191 करोड़ की परियोजना और विवादित आपूर्तिकर्ता
इंदौर रेलवे स्टेशन से एयरपोर्ट तक भूमिगत मेट्रो निर्माण के लिए HCC–टाटा जॉइंट वेंचर को लगभग ₹2,191 करोड़ का ठेका दिया गया है। यह कार्य तकनीकी रूप से अत्यंत जटिल, जोखिमपूर्ण और संवेदनशील माना जाता है, जहाँ मशीनों की गुणवत्ता ही परियोजना की सफलता तय करती है।
ऐसे में यह जानकारी सामने आना चौंकाने वाली है कि इस प्रोजेक्ट के लिए HCC, टेराटेक लिमिटेड (Terratec Limited) जो JIMT ग्रुप से संबद्ध बताई जाती है से चार टनल बोरिंग मशीनें खरीद रही है जो ख़ुद सवालों के घेरे में हे । यहाँ एक बुनियादी प्रश्न खड़ा होता है कि क्या वैश्विक साख वाली कंपनियां ऐसे आपूर्तिकर्ता पर भरोसा कर सकती हैं, जिसका ट्रैक रिकॉर्ड पहले से विवादों में रहा हो?
TBM मशीन सप्लायर (टेराटेक) का विवादित ट्रैक रिकॉर्ड
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिकॉर्ड (https://mphc.gov.in/case-status) के अनुसार, टेराटेक और उसके वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ तकनीकी खामियों तथा धोखाधड़ी से जुड़े कई आपराधिक एवं दीवानी प्रकरण दर्ज हैं।
उपलब्ध जानकारी और संबंधित पक्षों के अनुसार, कंपनी पर गंभीर आरोप हैं जिसमे —
• बिना पूर्व सूचना कर्मचारियों को साइट से हटाना और मशीने बंद करवा देना
• आवश्यक स्पेयर पार्ट्स को मनमाने एवं अत्यधिक मूल्य पर खरीदने के लिए दबाव बनाना
• अपनी शर्तें मनवाने के लिए अचानक अनुबंध समाप्त कर देना
• ठेकेदारों और साझेदार कंपनियों पर अनुचित व्यावसायिक दबाव बनाना
यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो ऐसे आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता इंदौर मेट्रो जैसी महत्वपूर्ण परियोजना के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न कर सकती है।
मशीनों की गुणवत्ता और सेवा पर उठे सवाल
सूत्रों के अनुसार—
यदि ये आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो इंदौर मेट्रो जैसे हाई-प्रोफाइल और संवेदनशील प्रोजेक्ट में ऐसी कंपनी की भागीदारी गंभीर चिंता का विषय है, विशेषकर तब, जब उसकी मशीनों की कार्यकुशलता और आफ्टर-सेल्स सेवा दोनों ही संदेह के घेरे में हों।
भोपाल के लिए क्यों बज सकती है खतरे की घंटी?
भोपाल और इंदौर दोनों मेट्रो परियोजनाएं मध्य प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (MPMRCL) के अधीन हैं। ऐसे में इंदौर में होने वाली किसी भी बड़ी तकनीकी चूक का असर भोपाल परियोजना पर भी पड़ सकता है।
1. बजट पर सीधा असर
यदि दोषपूर्ण मशीनों के कारण—
तो अतिरिक्त वित्तीय बोझ राज्य सरकार पर आएगा, जिसका असर भोपाल मेट्रो के विस्तार और अन्य शहरी परियोजनाओं पर पड़ सकता है।
2. समयसीमा पर संकट
मेट्रो परियोजनाएं पहले ही कड़े समयबद्ध दबाव में हैं। किसी भी बड़ी तकनीकी विफलता से वर्षों की देरी संभव है, जिससे जनता का भरोसा कमजोर होगा।
3. आधिकारिक जवाबदेही पर सवाल
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि—
जनता के टैक्स और भविष्य का दांव
मेट्रो परियोजना में लगाया गया हर रुपया आम नागरिक की मेहनत की कमाई है। ऐसे में
जनहित और सुरक्षा के आधार पर होना चाहिए।
घटिया उपकरणों से होने वाली देरी और लागत वृद्धि का बोझ अंततः जनता को ही उठाना पड़ता है चाहे वह टैक्स के रूप में हो या अधूरी सुविधाओं के रूप में।
प्रतिष्ठा के अनुरूप पारदर्शिता अनिवार्य
जब किसी परियोजना की कमान टाटा प्रोजेक्ट्स और HCC जैसे अनुभवी और प्रतिष्ठित संगठनों के हाथ में हो, तो उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे
इंदौर की सुरंगों में की गई कोई भी चूक भोपाल के विकास की रफ्तार को भी धीमा कर सकती है।
तकनीकी ऑडिट की तत्काल आवश्यकता
मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए अब यह अत्यंत आवश्यक है कि
यह मामला केवल एक परियोजना का नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के भविष्य के इंफ्रास्ट्रक्चर की विश्वसनीयता से जुड़ा है।
यह विकास की उड़ान या जोखिम भरा प्रयोग साबित हो सकता है
इंदौर मेट्रो प्रदेश की प्रगति का प्रतीक है। लेकिन विवादित और गुणवत्ता पर लगे प्रश्न चिन्ह वाली कंपनियों ने इस सपने पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि समय रहते पारदर्शिता से जांच नहीं हुई, तो यह परियोजना “विकास की मिसाल” से “प्रशासनिक चूक का उदाहरण” बन सकती है।
अब जिम्मेदारी सरकार, मेट्रो प्रशासन और ठेकेदार कंपनियों की है कि वे जनता के पैसे और नागरिकों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता न करें।